वाशिंगटन। दुनिया इस सदी के अंत तक हर साल लगभग दो महीने तक अत्यधिक गर्म दिनों का सामना करेगी और इसका सबसे ज्यादा असर छोटे व गरीब देशों पर पड़ेगा, जबकि सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों को इसकी मार कम झेलनी पड़ेगी। बृहस्पतिवार को जारी एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है।
 
 
हालांकि, 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के बाद से उत्सर्जन कम करने के प्रयासों ने गंभीर स्थिति को कुछ हद तक रोका है। अध्ययन के मुताबिक, अगर यह समझौता नहीं हुआ होता तो पृथ्वी को हर साल 114 और घातक गर्म दिनों का सामना करना पड़ता। वर्ल्ड वेदर एट्िरब्यूशन और अमेरिका स्थित क्लाइमेट सेंट्रल के वैज्ञानिकों ने विभिन्न मॉडल की वास्तविक समय के साथ तुलना करते हुए कंप्यूटर के जरिए यह गणना की है कि पेरिस समझौते से कितनी राहत मिली है।
 
 
अध्ययन के अनुसार, यदि सभी देश अपने वादों को पूरा करते हैं और वर्ष 2100 तक तापमान 2.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो दुनिया को अब की तुलना में 57 अतिरिक्त गर्म दिन झेलने होंगे। लेकिन यदि तापमान चार डिग्री सेल्सियस बढ़ा तो यह संख्या दोगुनी हो जाएगी।