मॉस्को। संस्कृत और भारतीय दर्शन के प्रख्यात रूसी विद्वान डॉ. मार्किस गासंस अगले सप्ताह भारत के कुरुक्षेत्र में आयोजित अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव को संबोधित करेंगे।  सोवियत संघ के दौरान लात्विया में जन्मे 42 वर्षीय गासंस संस्कृत जीलॉट्स सोसाइटी ऑफ रशिया के संस्थापक हैं। वह रूसी भारत कला-संस्कृति विशेषज्ञों की नई पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।भारत के 10 दिवसीय यात्रा पर रवाना होने की पूर्व संध्या पर गासंस ने पीटीआई-भाषा से ऑनलाइन बातचीत में कहा कि वह नालंदा विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित धर्म और वैश्विक नैतिकता: भारतीय शास्त्र परंपरा से अंतर्दृष्टि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी एक शोध पत्र प्रस्तुत करने के कार्यक्रम में शामिल होंगे।

रूसी विद्वान ने कहा कि वह उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा हरिद्वार में आयोजित अंतरराष्ट्रीय गंगा संगम सम्मेलन में भी एक और शोध पत्र प्रस्तुत करेंगे। गासंस ने कहा कि 13 वर्ष की उम्र तक उन्होंने भगवद गीता के कई संस्करणों को पूरी तरह पढ़ लिया था और लगभग इसी दौरान उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा कबीर के बारे में सुनाई गई कथाओं को आत्मसात किया। 

उन्होंने कहा, 18 साल की उम्र में, मैंने कुछ कबीर की दोहों का लैटिश (लात्विया की भाषा) में अनुवाद भी किया, जो रीगा में एक पत्रिका में प्रकाशित हुए।  गासंस ने कहा, दरअसल, वह कबीर थे जिन्होंने मुझे संस्कृत का अध्ययन करने को प्रेरित किया। 

 उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा, जब 2002 में मुझे कबीर की रचनाओं का अनुवाद उनकी मूल ब्रज भाषा से करने की इच्छा हुई, तो मैंने सोचा कि किसी मध्यकालीन भारतीय भाषा को उसके पूवर्ती संस्कृत सीखे बिना (अनुवाद) करना बुद्धिमानी नहीं होगी।  गासंस ने अबतक बिबलियोथेका संस्कृतिका नाम की श्रृंखला से 20 किताब लिखे हैं।